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रवींद्रनाथ टैगोर के 165वें जन्मदिन पर टैगोर परिवार के व्यंजनों की एक यात्रा

कोलकाता। रवींद्रनाथ टैगोर, देश के महान कवि, दार्शनिक और नोबेल पुरस्कार विजेता, अपनी साहित्यिक योगदानों के साथ-साथ अपने पारंपरिक और समकालीन खानपान के लिए भी जाने जाते हैं। इस बार उनके 165वें जन्मदिन के अवसर पर, शेफ और खाद्य अभिलेखकर्ता शुभजीत भट्टाचार्य हमें टैगोर के परिवार के रसोईघर में एक अनूठी यात्रा पर ले जाते हैं, जहां बंगाली और यूरोपीय पाकशैली का संगम देखने को मिलता था।

शुभजीत भट्टाचार्य ने बताया कि रवींद्रनाथ टैगोर के घर में खाने-पीने की परंपराएं न केवल बंगाली परंपरा पर आधारित थीं, बल्कि वहाँ यूरोपीय व्यंजन भी बड़े प्रेम के साथ बनाए जाते थे। यह मिश्रण उस समय के सांस्कृतिक और सामाजिक बदलावों का प्रतीक था।

‘‘टैगोर घराने में खाना केवल पोषण का माध्यम नहीं था, बल्कि एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान का जरिया था।’’ शुभजीत ने कहा। उन्होंने बताया कि टैगोर परिवार की रसोई में प्रयोग लगातार होते रहते थे, जिसमें यूरोपीय हॉर्स डिश से लेकर पारंपरिक बंगाली मछली के पकवान शामिल थे।

बंगाली व्यंजनों में मातर पटल, चिंगरी मच्छेर झोल, और भात जैसे पारंपरिक पकवान प्रमुख थे जबकि यूरोपीय प्रभावों में सौतेड वेजिटेबल्स, ग्रेवी आधारित व्यंजन, और बेकरी उत्पाद भी शामिल थे। यह मिश्रण उस दौर में बंगाल के सांस्कृतिक खुलेपन को दर्शाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पाक प्रयोग रवींद्रनाथ के साहित्यिक और दार्शनिक दृष्टिकोण को भी प्रतिबिंबित करता है, जहां परंपरा और आधुनिकता का मेल होता था। टैगोर के रसोईघर की यह कहानी आज भी हमें उनके परिवार की जीवनशैली और सांस्कृतिक भावना की झलक देती है।

इस विशेष अवसर पर, शुभजीत भट्टाचार्य द्वारा टैगोर के पारंपरिक व्यंजनों को आधुनिक संदर्भ में फिर से जीवित करने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि नई पीढ़ी भी इस सांस्कृतिक धरोहर को समझ सके।

रवींद्रनाथ के 165वें जन्मदिन पर यह यात्रा न केवल उनके साहित्यिक योगदानों का सम्मान है, बल्कि उस सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रतीक है जो उनके खानपान में छिपी हुई है।

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