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स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी के रोगियों के लिए दुर्लभ रोग नीति के तहत जेनेरिक रिस्डिप्लम तक पहुंच की मांग

नई दिल्ली। हाल ही में भारत में निर्मित जेनेरिक रिस्डिप्लम की उपलब्धता ने स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी (एसएमए) से पीड़ित लोगों के लिए एक नई उम्मीद जगाई है। एसएमए एक दुर्लभ और जानलेवा न्यूरोमस्कुलर रोग है, जिसमें रोगियों की जीवनशक्ति तेजी से प्रभावित होती है। मरीजों और उनके परिवारों ने प्रधानमंत्री को एक पत्र के माध्यम से इस दवा तक त्वरित पहुंच सुनिश्चित करने की अपील की है।

स्पाइनल मस्कुलर एट्रोफी में मांसपेशियों की कमजोरी और सिकुड़न होती है, जिससे श्वसन और चलने जैसी सामान्य क्रियाएं प्रभावित होती हैं। इस स्थिति में समय पर उपचार अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि लेट होने पर रोगी की स्थिति अपरिवर्तनीय रूप से गंभीर हो सकती है। मरीजों का कहना है कि जेनेरिक रिस्डिप्लम उनके इलाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, किंतु इसके लिए नीति के तहत उचित व्यवस्था आवश्यक है।

भारत में निर्मित इस जेनेरिक दवा की कीमत विदेशी संस्करणों की तुलना में अधिक किफायती है, जो लाखों रुपये तक हो सकती है। इस उपलब्धता से मरीजों को महंगे उपचार में राहत मिलने की उम्मीद बढ़ी है। दुर्लभ रोग नीति के तहत इस दवा को शामिल कर सरकार को मरीजों के लिए उपचार को सुलभ और किफायती बनाने पर ध्यान देना चाहिए।

विशेषज्ञों का मानना है कि समय से उपचार की कमी से मरीजों के स्वास्थ्य में तेजी से गिरावट आती है, जो कई बार जीवन के लिए खतरा बन जाती है। इसलिए, जेनेरिक रिस्डिप्लम की त्वरित उपलब्धता और वितरण इस बीमार स्थिति से जूझ रहे मरीजों के लिए जीवनदायिनी साबित हो सकती है।

सरकार के इस दिशा में उठाए गए कदमों की सख्त जरूरत है, ताकि मरीजों को दवा के लिए ऊँचे खर्च से बचाया जा सके और वे अपनी सामान्य जीवनशैली को बरकरार रख सकें। अधिकारिक सूत्रों ने भी संकेत दिया है कि इस मामले पर विचार चल रहा है, और जल्द ही नीति में आवश्यक संशोधन किए जा सकते हैं।

इस प्रकार, जेनेरिक रिस्डिप्लम की उपलब्धता एसएमए के रोगियों के लिए एक नए अध्याय का प्रारंभ हो सकता है, बशर्ते सरकार इस दवा तक पहुंच को न्यूनतम जटिलताओं के साथ सुनिश्चित करें। मरीजों और उनकी परिवारों की इस मांग को गंभीरता से लेना आवश्यक है, क्योंकि उनका कल्याण सीधे तौर पर इस उपलब्धता पर निर्भर करता है।

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