महामारी के बाद गर्भवती महिलाओं में सिफलिस के मामले तेजी से बढ़े – जानिए कारण

देश में गर्भवती महिलाओं में सिफलिस के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस बीमारी के प्रसार को रोकने के लिए आवश्यक है कि सभी गर्भवती महिलाओं की जांच नियमित रूप से तीन समय पर हो: पहले तिमाही में, तीसरे तिमाही में और प्रसव के समय।
सिफलिस एक यौन संक्रमित बीमारी है, जो यदि गर्भावस्था के दौरान ठीक से नहीं जांची और उपचारित की जाए तो नवजात शिशु को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। ऐसा होने पर बच्चे में जन्मजात सिफलिस हो सकती है, जो आपके नए जीवन की शुरुआत को खतरे में डालती है।
सिफलिस के कारण गर्भपात, मृत जन्म, नवजात की मृत्यु और गम्भीर विकृतियां हो सकती हैं। इसलिए, माताओं की समय पर जांच और उपचार अत्यंत आवश्यक है। विशेषज्ञ इसके लिए सार्वभौमिक स्क्रिनिंग की सलाह देते हैं, जिसके तहत सभी गर्भवती महिलाओं की तीन बार जांच की जाती है। इससे न केवल माओं का बल्कि जन्में बच्चे का भी जीवन सुरक्षित रहता है।
स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल ही में गर्भवती महिलाओं के लिए सिफलिस जांच को प्राथमिकता दी है और गर्भावस्था के दौरान इस बीमारी की रोकथाम के लिए जागरूकता अभियान तेज कर दिया है।
डॉक्टरों का कहना है कि प्रारम्भिक जांच से सिफलिस का पता चलने पर आसानी से इलाज शुरू किया जा सकता है, जिससे संक्रमण रोकना संभव हो जाता है। यदि इस जांच को नजरअंदाज किया जाता है, तो संक्रमण प्रसूतिगृह में भी फैल सकता है और नवजात शिशु को मार सकता है।
समय पर इलाज में पेनिसिलिन जैसे प्रभावी एंटीबायोटिक दवाओं का इस्तेमाल होता है, जो पूरी तरह से सिफलिस का उपचार करते हैं। हालांकि, यदि उपचार में देरी होती है तो जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं।
सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों के माध्यम से गर्भवती महिलाओं को संक्रमण से बचाव के लिए जानकारी दी जा रही है, साथ ही जांच सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जा रही हैं।
इस बढ़ते खतरे को कम करने के लिए यह अति आवश्यक है कि सभी गर्भवती महिलाएं नियमित जांच कराएं और यदि संक्रमण पाया जाता है तो तत्काल चिकित्सीय सलाह लें। केवल तभी हम जन्मजात सिफलिस को पूरी तरह नियंत्रित कर सकते हैं और सुरक्षित मातृत्व सुनिश्चित कर सकते हैं।



